लोकेशन, समस्तीपुर ,धर्म विजय गुप्ता की रिपोर्ट।
समस्तीपुर/खानपुर। खानपुर प्रखंड की 19 पंचायतों में विकास योजनाओं के क्रियान्वयन और सरकारी राशि के खर्च को लेकर लगातार सवाल उठते रहे हैं। इसी कड़ी में अब बिशनपुर आभी पंचायत में जल निकासी नाला निर्माण योजना को लेकर गंभीर आरोप सामने आए हैं। ग्रामीणों का आरोप है कि विकास के नाम पर लाखों रुपये की राशि खर्च दिखाई गई, लेकिन धरातल पर उसके अनुरूप काम नजर नहीं आ रहा है।उपलब्ध अभिलेखों के अनुसार बिशनपुर आभी पंचायत में जल निकासी नाली निर्माण के लिए ₹14,93,900 की अनुमानित लागत दर्ज है, जबकि निर्माण कार्य पर ₹14,07,960 खर्च किए जाने की बात सामने आ रही है। यह कार्य 15वें वित्त आयोग की बंधित अनुदान राशि से कराया गया बताया जा रहा है।
लेकिन अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि इतनी बड़ी राशि खर्च होने के बाद जमीन पर वास्तव में कितना निर्माण हुआ?आबादी से दूर नाला, ग्रामीणों ने पूछा—किसके लिए बना? ग्रामीणों का आरोप है कि नाली का निर्माण गांव के टोला-मोहल्लों और घरों से काफी दूरी पर चौर-गाछी क्षेत्र में करा दिया गया। ग्रामीणों के अनुसार जिस उद्देश्य से जल निकासी की योजना बनाई गई थी, उस उद्देश्य की पूर्ति मौके पर दिखाई नहीं देती।ग्रामीणों का कहना है कि यदि नाली लोगों के घरों और आबादी से निकलने वाले पानी की निकासी के लिए बनाई गई थी, तो उसे ऐसी जगह बनाया जाना चाहिए था जहां वास्तव में जल निकासी की समस्या मौजूद हो। लेकिन आरोप है कि निर्माण ऐसी जगह कर दिया गया जहां न तो पर्याप्त आबादी है और न ही घरों का पानी इस नाले तक पहुंचता है।ऐसे में सवाल उठना स्वाभाविक है कि जब नाली से आम लोगों की जल निकासी की समस्या का समाधान ही नहीं हो रहा है, तो ₹14 लाख से अधिक की सरकारी राशि खर्च करने का औचित्य क्या है? कुछ दूरी में निर्माण, पूरी राशि खर्च होने का दावा? ग्रामीणों की ओर से यह भी आरोप लगाया जा रहा है कि मौके पर नाले का निर्माण अपेक्षाकृत सीमित दूरी में दिखाई देता है, जबकि अभिलेखों में लाखों रुपये की लागत का कार्य दर्ज है।हालांकि इन आरोपों की वास्तविकता का अंतिम निर्धारण सरकारी अभिलेख, तकनीकी मापी, एमबी बुक, योजना स्थल का सत्यापन और भुगतान संबंधी दस्तावेजों की जांच के बाद ही किया जा सकता है।इसीलिए ग्रामीणों ने मांग की है कि संबंधित विभाग के सक्षम अधिकारी मौके पर पहुंचकर नाले की लंबाई, चौड़ाई, गहराई और निर्माण में इस्तेमाल सामग्री की तकनीकी जांच करें तथा अभिलेखों में दर्ज मात्रा से उसका मिलान करें।’कागज पर विकास या जमीन पर काम?’ बड़ा सवाल।ग्रामीणों का कहना है कि जनता के टैक्स और सरकारी राजस्व से पंचायतों को विकास के लिए राशि मिलती है। ऐसे में प्रत्येक योजना का उद्देश्य आम जनता को वास्तविक लाभ पहुंचाना होना चाहिए।यदि किसी योजना में बड़ी राशि स्वीकृत और खर्च हो जाए, लेकिन उसका अपेक्षित लाभ जनता को नहीं मिले, तो इसकी जिम्मेदारी तय होना जरूरी है।ग्रामीणों ने सवाल उठाया है कि—
- योजना की वास्तविक लंबाई कितनी स्वीकृत हुई थी?
- मौके पर कितनी लंबाई में नाला बना?
- निर्माण की तकनीकी मापी किस अधिकारी ने की?
- एमबी बुक में कितनी मात्रा दर्ज है?
- भुगतान किस आधार पर किया गया?
- नाला निर्माण का वास्तविक उद्देश्य क्या था?
- क्या निर्माण स्थल का चयन तकनीकी रूप से उचित था?
- क्या भुगतान से पहले स्थल का भौतिक सत्यापन किया गया?
इन सवालों का जवाब संबंधित विभागीय अभिलेखों और निष्पक्ष जांच से ही सामने आ सकता है।सिर्फ नाली ही नहीं, अन्य योजनाओं पर भी सवाल।ग्रामीणों के आरोप यहीं तक सीमित नहीं हैं। पंचायत में पीसीसी सड़क, गली-नाली, मनरेगा, खड़ंजा तथा मिट्टी भराई जैसी विभिन्न योजनाओं के क्रियान्वयन को लेकर भी सवाल उठाए जा रहे हैं।आरोप है कि यदि पंचायत में पिछले दो पंचवर्षीय कार्यकाल के दौरान कराई गई सभी योजनाओं की सूची, प्रशासनिक स्वीकृति, तकनीकी स्वीकृति, प्राक्कलन, कार्यादेश, मापी पुस्तिका, भुगतान विवरण और योजना स्थल का भौतिक सत्यापन कराया जाए तो कई योजनाओं की वास्तविक स्थिति सामने आ सकती है।हालांकि इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि अभी आवश्यक है और किसी भी व्यक्ति या जनप्रतिनिधि को दोषी ठहराने से पहले सक्षम जांच एजेंसी द्वारा दस्तावेजों एवं स्थल का सत्यापन किया जाना जरूरी है।पंचायत के पूरे कार्यकाल की योजनाओं का हो सोशल ऑडिट। ग्रामीणों ने मांग की है कि केवल एक नाली योजना की जांच तक मामला सीमित न रखा जाए, बल्कि पंचायत में पिछले दो पंचवर्षीय कार्यकाल के दौरान कराई गई सभी प्रमुख विकास योजनाओं का सोशल ऑडिट और भौतिक सत्यापन कराया जाए।विशेष रूप से मनरेगा की योजनाओं में कार्यस्थल, मजदूरों की उपस्थिति, मस्टर रोल, भुगतान विवरण, सामग्री मद में हुए खर्च तथा योजना की वास्तविक स्थिति की जांच कराने की मांग की गई है।इसी तरह 15वें वित्त आयोग सहित अन्य मदों से कराए गए पीसीसी, नाली, गली, खड़ंजा, मिट्टी भराई और अन्य निर्माण कार्यों की भी अभिलेखों से स्थल तक जांच कराने की मांग उठ रही है।अधिकारियों की भूमिका पर भी सवाल।ग्रामीणों में इस बात को लेकर भी नाराजगी है कि यदि वास्तव में किसी योजना में अनियमितता हुई है तो योजना की स्वीकृति से लेकर मापी और भुगतान तक कई स्तरों पर जांच और सत्यापन की प्रक्रिया होती है।
ऐसे में सवाल सिर्फ पंचायत प्रतिनिधियों से नहीं बल्कि योजना से जुड़े तकनीकी एवं प्रशासनिक स्तर के अधिकारियों से भी पूछा जाना चाहिए कि आखिर किस आधार पर कार्य को पूर्ण मानते हुए भुगतान किया गया।यदि जांच में आरोप सही पाए जाते हैं तो सरकारी राशि की वसूली के साथ-साथ नियम के अनुसार जिम्मेदार लोगों पर कार्रवाई होनी चाहिए।फिलहाल बिशनपुर आभी पंचायत में ₹14,07,960 की बताई जा रही खर्च राशि वाली नाली योजना को लेकर ग्रामीणों के आरोपों ने पंचायत व्यवस्था और सरकारी योजनाओं की निगरानी पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।अब देखने वाली बात होगी कि प्रखंड प्रशासन और संबंधित विभाग इन आरोपों को कितनी गंभीरता से लेते हैं और क्या योजना की निष्पक्ष तकनीकी जांच कराई जाती है।ग्रामीणों की मांग स्पष्ट है—अभिलेख खोलिए, मौके पर मापी कराइए, भुगतान का मिलान कराइए और अगर सरकारी राशि में अनियमितता हुई है तो जिम्मेदारी तय कीजिए।क्योंकि सवाल किसी एक व्यक्ति का नहीं, बल्कि जनता के विकास के लिए खर्च की गई सरकारी राशि का है।
